अंकित त्रिपाठी की रिपोर्ट

पटना:- इन दिनों कोरोना जैसे मौजूदा हालात से पुरा देश जूझ रहा है. प्रकृति ने भी अपना रौद्र रूप धारण कर लिया है. सभी नदियां अभी उफान पर है और अत्यंत वर्षा होने के कारण बाढ़ जैसी स्थितियां बन रही है जिससे जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है जिसका सीधा-सीधा व्यापक असर किसानों एवं मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है. मौजूदा हालात के परिपेक्ष्य में पटना ग्रामीण एसपी IPS कांतेश कुमार मिश्रा ने अपनी एक अत्यंत संवेदनशील रचना देश के कृषको को समर्पित की है. इस संबंध में उक्त रचना के लेखक कांतेश कुमार   मिश्रा ने बताया कि छात्र जीवन उनका गांवों में ही बीता। सभी हालातो को ध्यान में रखते हुए ही यह रचना तैयार हो पाई है एवं खासकर कृषको की व्यथा को इसमें पिरोया गया। तो आइए आगे उनके द्वारा रचित पंक्तियों को पढेंगे जिसमें कि पूर्ण रचनाओं में किसानों को किस-किस तरह के समझौते करने होते हैं, वह पूर्णतः इन पंक्तियों में समाहित है. सभी पंक्तियां पूर्णतः भोजपुरी एवं गांवों में बोले जाने वाली आम भाषा का जोड़ है:-

(1) "गोड़ दुखात बा, मनवा अकुतात बा

भर दिन रात के, सुतल अनुहात बा।

      पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू! 


(2) तनी तनी देर से, भूख प्यास लागेला 

आंख कतनो मुंदेली, भितरा से जागे ला। 

      पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू


(3) काल्हू के बतिया, आजे भुला गईनी

टिस$ ता ठेहुना, फजिरे से अझुरा गईनी। 

      पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू


(4) कोस भर जवार के, नापत रहनी दिन भ$

 बितल बरिष महीना, गईला उनका दुआर प$। 

      पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू


(5) पूडी़ कचौड़ी से, करत रही नश्ता

    दूधभात खात-खात, हालत भईल खस्ता। 

       पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू


(6)पोरसा भर गडहा, भरत रही अकेले, 

ढोहत रही बोझा, उठ$ उठ$ सवेरे।

लोट$ओ अब उठत नइखे, आवतो बा कहु देखे। 

      पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू


(7) फाकत रही साझिया के, मकई बुंट के भूं$जा

चभनी ऊख पूस में, आ जेठ में खरबूजा।

हलुआ पुआ कब भेटाई, आ कैसे मिली खाजा।

       पूछला से बबुआ, 

      बोलेले बुढा़ गईलू

      जादे गड़बड़ा गईलू


(8) एके नियन भईल दिन-रात 

     का गरमी का बरसात

     कबो कबो लागेला

    सांचो हम बूढा़ गईनी 

    जादे गड़बड़ा गईनी!!


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Posted by : Raushan Pratyek Media

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